शैनेयाभ्युपपत्ति ते जानाम्याचार्यघधातिनि । न चैनं त्रास्यसि मया ग्रस्तमात्मानमेव च,'शिनिपौत्र! मैं जानता हूँ, आचार्यघाती धृष्टद्युम्नके प्रति तुम्हारा विशेष सहयोग एवं पक्षपात है; परंतु मेरे चंगुलमें फँसे हुए इस धृष्टद्यम्मको और अपनेको भी तुम बचा नहीं सकोगे
«ໂອ ສາຍເນຍະ (ຫລານຂອງຊິນິ)! ຂ້າຮູ້ດີວ່າເຈົ້າເອົາໃຈຊ່ວຍເຫຼືອ ແລະເຂົ້າຂ້າງທະຣິດທະຍຸມນະ ຜູ້ສັງຫານອາຈານ. ແຕ່ເຈົ້າຈະຊ່ວຍບໍ່ໄດ້ທັງຄົນນີ້—ຜູ້ຕົກຢູ່ໃນກຳມືຂ້າ—ແລະທັງຕົວເຈົ້າເອງ».
संजय उवाच