मुखं किंचित् समुन्नाम्य विष्ट भ्य उरमग्रत: । निमीलिताक्ष: सत्त्वस्थो निश्षिप्य हृदि धारणाम्,दिवमाक्रामदाचार्य: साक्षात् सद्धिर्दुराक्रमाम् । उन्होंने मुँहको कुछ ऊपर उठाकर छातीको आगेकी ओर स्थिर किया। फिर विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो नेत्र बंद करके हृदयमें धारणाको दृढ़तापूर्वक धारण किया। साथ ही “ओम” इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करते हुए वे महातपस्वी आचार्य द्रोण प्रणवके अर्थभूत देवदेवेश्वर अविनाशी परम प्रभु परमात्माका चिन्तन करते-करते ज्योतिःस्वरूप हो साक्षात् उस ब्रह्मलोकको चले गये, जहाँ पहुँचना बड़े-बड़े संतोंके लिये भी दुर्लभ है
sañjaya uvāca | mukhaṃ kiñcit samunnāmya viṣṭabhya uram agrataḥ | nimīlitākṣaḥ sattvastho niṣkṣipya hṛdi dhāraṇām | divam ākrāmad ācāryaḥ sākṣāt sadbhir durākramām ||
ສັນຊະຍະເວົ້າວ່າ: ອາຈານດໂຣນາຍົກໜ້າຂຶ້ນເລັກນ້ອຍ ແລະກະຊັບອົກໃຫ້ເອົາໜ້າ. ແລ້ວທ່ານປິດຕາ ຕັ້ງຢູ່ໃນສັດຕະວະອັນບໍລິສຸດ ແລະຍຶດສະມາທິພາຍໃນໃຫ້ໝັ້ນຄົງໃນຫົວໃຈ. ດັ່ງນັ້ນທ່ານຈຶ່ງຂຶ້ນໄປສູ່ໂລກສະຫວັນ—ແທ້ຈິງແມ່ນສະພາບທີ່ຍາກຈະເຖິງແມ່ນແຕ່ຜູ້ດີ ແລະຜູ້ສໍາເລັດທັງຫຼາຍ.
संजय उवाच