Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
पुत्रेण तेन प्रीतो5हं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्टवा धनिनस्तत्र पुत्रकान् अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद् दिश:,उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी। एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे। उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल-स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा। इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया--मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा
putreṇa tena prīto 'haṃ bharadvājo mayā yathā | gokṣīraṃ pibato dṛṣṭvā dhaninas tatra putrakān | aśvatthāmā rudad bālas tan me saṃdehayad diśaḥ ||
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: “ເພາະບຸດນັ້ນ ຂ້າພະເຈົ້າຍິນດີຢ່າງຫຼາຍ—ດັ່ງທີ່ບິດາຂອງຂ້າພະເຈົ້າ ພຣະພຣະດວາຊະ ເຄີຍຍິນດີຕໍ່ຂ້າພະເຈົ້າ. ແຕ່ມື້ໜຶ່ງ ເມື່ອເຫັນລູກຊາຍຂອງຄົນມັ່ງຄັ່ງດື່ມນົມງົວຢູ່ນັ້ນ, ລູກນ້ອຍອັສວັດຖາມາ ດ້ວຍຄວາມອ່ອນໄຫວແຫ່ງໄວເດັກ ກໍ່ຮ້ອງໄຫ້ ປາຖະໜານົມ. ເຫັນແລ້ວ ຈິດໃຈຂ້າພະເຈົ້າຖືກຄວາມມືດຄອບງຳ—ດັ່ງອັນມືດຕົກຕໍ່ໜ້າຕາ ແລະຂ້າພະເຈົ້າເກືອບຈະຈຳແນກທິດທາງບໍ່ໄດ້.”
वैशम्पायन उवाच