धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
मयैतत् कथितं सम्यक् तव मूर्तिचतुष्टयम्,“मैंने अपने वासुदेव, संकर्षण आदि चार स्वरूपोंका तुम्हारे सामने भलीभाँति वर्णन किया है। मैं ही जीव नामसे प्रसिद्ध हूँ, मुझमें ही जीवकी स्थिति है; परंतु तुम्हारे मनमें ऐसा विचार नहीं उठना चाहिये कि मैंने जीवको देखा है
ನಾನು ನಿನಗೆ ನನ್ನ ನಾಲ್ಕು ಮೂರ್ತಿಗಳ ವಿಷಯವನ್ನು ಸಮ್ಯಕವಾಗಿ ಹೇಳಿದ್ದೇನೆ.
भीष्म उवाच