Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Saṃvāda on Restraint and Rājānīti
Chapter 50
वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत् स वृकोदर: । शत्रोऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम्,भारत! बिन्दु-सरोवरसे लाये हुए रत्नोंद्वारा मयासुरने एक कृत्रिम पुष्करिणीका निर्माण किया था, जो स्फटिकमणिकी शिलाओंसे आच्छादित है। वह मुझे जलसे भरी हुई-सी दिखायी दी। भारत! जब मैं उसमें उतरनेके लिये वस्त्र उठाने लगा, तब भीमसेन ठठाकर हँस पड़े। शत्रुकी विशिष्ट समृद्धिसे मैं मूढ़-सा हो रहा था और रत्नोंसे रहित तो था ही
vastram utkarṣati mayi prāhasat sa vṛkodaraḥ | śatro ṛddhi-viśeṣeṇa vimūḍhaṁ ratna-varjitam |
ದುರ್ಯೋಧನನು ಹೇಳಿದನು—ನಾನು ವಸ್ತ್ರವನ್ನು ಮೇಲಕ್ಕೆತ್ತುತ್ತಿದ್ದಂತೆಯೇ ವೃಕೋದರ (ಭೀಮ) ನನ್ನನ್ನು ನೋಡಿ ಜೋರಾಗಿ ನಕ್ಕನು. ಶತ್ರುವಿನ ಅಪೂರ್ವ ವೈಭವದಿಂದ ನಾನು ಮರುಳಾಗಿ ನಿಂತೆ—ರತ್ನವಿಲ್ಲದೆ, ಗೌರವವಿಲ್ಲದೆ ಎಂಬಂತೆ.
दुर्योधन उवाच