तमब्रवीत् ततो राजा प्रीयमाण: पुनः पुनः । द्रोणकर्णादिभि: सार्ध पर्याप्तो5हं द्विषद्वधे,अभियाति द्रुतं कर्ण तद् वारय महारथम् । संजय कहते हैं--राजन! युद्धस्थलमें इस प्रकार कर्णका वध करनेकी इच्छासे उद्यत हुए घटोत्कचको सूतपुत्रके रथकी ओर आते देख आपके पुत्र दुर्योधनने दःशासनसे इस प्रकार कहा--'भाई! यह राक्षस रणभूमिमें कर्णका वेगपूर्वक पराक्रम देखकर तीव्र गतिसे उसपर आक्रमण कर रहा है; अतः उस महारथी घटोत्कचको रोको तब राजा दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार उससे कहा--“वीरवर! द्रोणाचार्य और कर्ण आदिके साथ मिलकर मैं स्वयं ही तुम्हारे शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हूँ। तुम तो मेरी आज्ञासे घटोत्कवके पास जाओ और युद्धमें उसे मार डालो। वह क्रूरकर्मा निशाचर मनुष्य और राक्षस दोनोंके अंशसे उत्पन्न हुआ है
tam abravīt tato rājā prīyamāṇaḥ punaḥ punaḥ | droṇa-karṇādibhiḥ sārdhaṃ paryāpto 'haṃ dviṣad-vadhe, abhiyāti drutaṃ karṇa tad vārayā mahā-ratham ||
ಸಂಜಯನು ಹೇಳಿದನು—ಆಮೇಲೆ ರಾಜ ದುರ್ಯೋಧನನು ಸಂತೋಷದಿಂದ ಪುನಃ ಪುನಃ ಅವನಿಗೆ ಹೇಳಿದನು—“ದ್ರೋಣ, ಕರ್ಣ ಮೊದಲಾದವರೊಂದಿಗೆ ನಾನು ಶತ್ರುಸಂಹಾರಕ್ಕೆ ಸಾಕು. ಆದರೆ ಆ ಮಹಾರಥಿ ಕರ್ಣನ ಕಡೆಗೆ ವೇಗವಾಗಿ ಧಾವಿಸುತ್ತಿದ್ದಾನೆ; ನೀನು ಹೋಗಿ ಅವನನ್ನು ತಡೆ.”
संजय उवाच
The verse illustrates how attachment and fear for a valued ally can drive urgent commands in war, while the language of “enemy-slaying” shows the moral narrowing that occurs when victory becomes the overriding aim.
Sañjaya reports that Duryodhana, pleased and confident with Droṇa and Karṇa on his side, orders someone to quickly restrain a powerful attacker who is rushing toward Karṇa.