ययातेर्वानप्रस्थतपःस्वर्गारोहणम् | Yayāti’s Vānaprastha Austerities and Ascent to Heaven
तेन दासीसहस््रेण सार्थ शर्मिछ्ठया तदा । तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
tena dāsīsahasreṇa sārtha śarmiṣṭhayā tadā | tameva deśaṃ samprāptā yathākāmaṃ cacāra sā ||
ಆಗ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆಯೂ ಸಾವಿರ ದಾಸಿಯರೊಂದಿಗೆ ಅವಳ ಜೊತೆಯಲ್ಲಿದ್ದಳು. ಅವಳು ಅದೇ ಸ್ಥಳಕ್ಕೆ ತಲುಪಿ ಸಖಿಯರೊಂದಿಗೆ ಇಚ್ಛೆಯಂತೆ ವಿಹರಿಸಿದಳು.
वैशम्पायन उवाच