
ययातेर्वानप्रस्थतपःस्वर्गारोहणम् | Yayāti’s Vānaprastha Austerities and Ascent to Heaven
Upa-parva: Sambhava Parva (Genealogies and Origins)
Vaiśaṃpāyana reports that King Yayāti, son of Nāhuṣa, joyfully installs his desired heir (Pūru) and withdraws to the forest as a vānaprastha, living with Brahmins on fruits and roots with self-control. Through disciplined ritual conduct—tending sacred fires, offerings according to rule, honoring guests with forest oblations, and subsisting in a gleaner-like manner—he undertakes prolonged austerities: extended regulation of speech and mind, periods of water-only subsistence, then air-only subsistence, penance amid five fires, and one-legged standing. He reaches heaven by merit, resides happily, then is said to be cast down by Śakra (Indra), remaining suspended in midair before earth-contact. A tradition is noted that he again attained heaven after meeting other kings (including Vasumat, Aṣṭaka, Pratardana, and Śibi) in an assembly. Janamejaya then asks what specific karma enabled Yayāti’s renewed ascent, prompting Vaiśaṃpāyana to continue with the “later account” that is described as meritorious and sin-destroying to hear.
Chapter Arc: वन-प्रदेश में सखियों और दासियों के साथ देवयानी तथा शर्मिष्ठा का विहार—उसी एकांत में राजा ययाति का आगमन, मानो भाग्य स्वयं दो कुलों को आमने-सामने ले आया हो। → देवयानी ‘विधान’ (दैव-नियत) की बात कहकर प्रसंग को ऊँचा उठाती है, फिर ययाति से पूछती है कि वह इस वन में किस प्रयोजन से आया है। संवाद के भीतर ही संकेत उभरता है कि यह भेंट साधारण नहीं—यह विवाह, राजनीति और भविष्य की संतति-रेखा को मोड़ने वाली है। → देवयानी ययाति से स्पष्ट निवेदन करती है कि वह उसकी रक्षा-आश्रय बने—‘सखा, भर्ता’ बने—और साथ ही वह शर्मिष्ठा (वृषपर्वा की पुत्री) को भी ययाति के संरक्षण में सौंपते हुए मर्यादा-सीमा रखती है: उसका सत्कार हो, पर उसे शय्या पर न बुलाया जाए। → शुक्राचार्य की स्वीकृति और सम्मान के साथ ययाति को देवयानी, शर्मिष्ठा तथा दासियों/कन्याओं के साथ विदा किया जाता है; ययाति प्रसन्न होकर अपने नगर लौटता है—विवाह-संबंध स्थापित, पर भीतर एक निषिद्ध-रेखा भी खींच दी गई। → देवयानी की शर्त—‘शर्मिष्ठा को शय्या पर न बुलाना’—भविष्य के संघर्ष का बीज बनकर रह जाती है: क्या राजा वचन निभा पाएगा, या काम-धर्म और राज-धर्म की टकराहट अनिवार्य है?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५६ श्लोक मिलाकर कुल ३२३ “लोक हैं) नफमशा (0) अमन न एकाशीतितमो< ध्याय: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह वैशम्पायन उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य देवयानी नृपोत्तम । वन॑ तदेव निर्याता क्रीडार्थ वरवर्णिनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದರು—ಓ ನೃಪೋತ್ತಮನೇ! ದೀರ್ಘಕಾಲ ಕಳೆದ ಬಳಿಕ ಶುಭವರ್ಣಳಾದ ದೇವಯಾನಿ ಕ್ರೀಡಾರ್ಥವಾಗಿ ಮತ್ತೆ ಅದೇ ಅರಣ್ಯಕ್ಕೆ ಹೊರಟಳು.
Verse 2
तेन दासीसहस््रेण सार्थ शर्मिछ्ठया तदा । तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
ಆಗ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆಯೂ ಸಾವಿರ ದಾಸಿಯರೊಂದಿಗೆ ಅವಳ ಜೊತೆಯಲ್ಲಿದ್ದಳು. ಅವಳು ಅದೇ ಸ್ಥಳಕ್ಕೆ ತಲುಪಿ ಸಖಿಯರೊಂದಿಗೆ ಇಚ್ಛೆಯಂತೆ ವಿಹರಿಸಿದಳು.
Verse 3
ताभि: सखीभि: सहिता सर्वाभिमुदिता भृशम् । क्रीडन्त्योडभिरता: सर्वा: पिबन्त्यो मधुमाधवीम्,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
ಸಖಿಯರೊಂದಿಗೆ ಸೇರಿ ಅವರೆಲ್ಲರೂ ಅತ್ಯಂತ ಹರ್ಷಿತರಾಗಿ, ನೀರಿನ ಬಳಿಯಲ್ಲಿ ಕ್ರೀಡೆಯಲ್ಲಿ ತಲ್ಲೀನರಾಗಿ, ಮಧುರವಾದ ಮಾಧವೀ-ರಸವನ್ನು ಪಾನಮಾಡುತ್ತಿದ್ದರು.
Verse 4
खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् विदशन्त्य: फलानि च । पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದರು—ಆ ಯುವತಿಯರು ನಾನಾವಿಧ ಭಕ್ಷ್ಯಗಳನ್ನು ತಿನ್ನುತ್ತಾ, ಹಣ್ಣುಗಳನ್ನು ಕಚ್ಚುತ್ತಾ ಕ್ರೀಡೆಯಲ್ಲಿ ಆನಂದಮಗ್ನರಾಗಿದ್ದರು. ಅಷ್ಟರಲ್ಲಿ ದೈವಯೋಗದಿಂದ, ಬೇಟೆಯ ಆಸೆಯಿಂದ ನಹುಷವಂಶಜ ರಾಜ ಯಯಾತಿ ಮತ್ತೆ ಅದೇ ಸ್ಥಳಕ್ಕೆ ಬಂದನು.
Verse 5
तमेव देशं सम्प्राप्तो जलार्थी श्रमकर्शित: । ददृशे देवयानीं स शर्मिष्ठां ताश्न॒ योषित:,उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनके उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सभी किशोरियाँ वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये दैवेच्छासे उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंकों भी देखा
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದರು—ಶ್ರಮದಿಂದ ಕುಗ್ಗಿ, ನೀರನ್ನು ಬಯಸುತ್ತಾ ಅವನು ಅದೇ ಸ್ಥಳಕ್ಕೆ ಬಂದನು. ಅಲ್ಲಿ ಅವನು ದೇವಯಾನಿ, ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆ ಹಾಗೂ ಇತರ ಯುವತಿಯರನ್ನು ಕಂಡನು.
Verse 6
पिबन्तीर्ललमानाश्व दिव्याभरणभूषिता: । (आसने प्रवरे दिव्ये सर्वाभरण भूषिते ।) उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम्,वे सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो पीनेयोग्य रसका पान और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ समस्त आभूषणोंसे विभूषित परम सुन्दर दिव्य आसनपर बैठी हुई देखा
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದರು—ದಿವ್ಯಾಭರಣಗಳಿಂದ ಅಲಂಕರಿಸಲ್ಪಟ್ಟ ಆ ಸ್ತ್ರೀಯರು ಪಾನೀಯವನ್ನು ಕುಡಿಯುತ್ತಾ ನಾನಾವಿಧ ಕ್ರೀಡೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿದ್ದರು. ಅಲ್ಲಿ ರಾಜನು ಶುದ್ಧಸ್ಮಿತೆಯಾದ ದೇವಯಾನಿಯನ್ನು ಕಂಡನು—ಅವಳು ಸರ್ವಾಭರಣಗಳಿಂದ ಶೋಭಿಸುವ ಪರಮಸುಂದರ ದಿವ್ಯಾಸನದಲ್ಲಿ ಆಸೀನಳಾಗಿದ್ದಳು.
Verse 7
रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराड़नाम् । शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभि:,उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठाद्वारा उसकी चरणसेवा की जा रही थी
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದರು—ಆ ಸ್ತ್ರೀಯರ ನಡುವೆ ಅವಳು ರೂಪದಲ್ಲಿ ಅಪ್ರತಿಮೆಯಾದ ಪರಮಸುಂದರಿ. ಅವಳು ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ಆಸೀನಳಾಗಿದ್ದಳು; ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆ ಅವಳ ಪಾದಸಂವಾಹನಾದಿ ಸೇವೆಗಳಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿದ್ದಳು.
Verse 8
ययातिरुवाच द्वाभ्यां कन्न्यासहस्राभ्यां द्वे कन््ये परिवारिते । गोत्रे च नामनी चैव द्वयो: पृच्छाम्यहं शुभे,ययातिने पूछा--दो हजार- कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन््याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದರು—ಹೇ ಶುಭೆಯರೇ, ಕನ್ಯೆಯರೇ! ನೀವು ಇಬ್ಬರೂ ಎರಡು ಸಾವಿರ ಕನ್ಯಾ ಸಖಿಯರಿಂದ ಪರಿವೃತರಾಗಿದ್ದೀರಿ. ನಿಮ್ಮಿಬ್ಬರ ಗೋತ್ರವೂ ಹೆಸರೂ ನಾನು ಕೇಳುತ್ತೇನೆ; ನಿಮ್ಮ ಪರಿಚಯವನ್ನು ಹೇಳಿರಿ.
Verse 9
देवयान्युवाच आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचन मे नराधिप । शुक्रो नामासुरगुरु: सुतां जानीहि तस्य माम्,देवयानी बोली--महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ಓ ನರಾಧಿಪ, ನಾನು ನನ್ನ ಪರಿಚಯವನ್ನು ಹೇಳುತ್ತೇನೆ; ನನ್ನ ಮಾತನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸು. ಅಸುರರ ಪ್ರಸಿದ್ಧ ಗುರು ಶುಕ್ರಾಚಾರ್ಯ; ನಾನು ಅವರ ಪುತ್ರಿ ಎಂದು ತಿಳಿ.
Verse 10
इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी । दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वण:,यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी जायगी
ಇವಳು ನನ್ನ ಸಖಿಯೂ ದಾಸಿಯೂ; ನಾನು ಎಲ್ಲಿಗೆ ಹೋದರೂ ಇವಳೂ ಅಲ್ಲಿ ಹೋಗುವಳು. ಇವಳು ದಾನವೇಂದ್ರ ವೃಷಪರ್ವನ ಪುತ್ರಿ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆ.
Verse 11
ययातिरुवाच कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी । असुरेन्द्रसुता सुभ्रू: परं कौतूहलं हि मे,ययाति बोले--सुन्दरी! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದರು—ಓ ವರವರ್ಣಿನಿ, ಅಸುರೇಂದ್ರನ ಈ ರೂಪವತಿ, ಸುಂದರ ಭ್ರೂಗಳಿರುವ ಪುತ್ರಿ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆ ನಿನ್ನ ಸಖಿಯೂ ದಾಸಿಯೂ ಹೇಗೆ ಆಯಿತು? ಇದನ್ನು ಕೇಳಲು ನನಗೆ ಅಪಾರ ಕುತೂಹಲ.
Verse 12
देवयान्युवाच सर्व एव नरश्रेष्ठ विधानमनुवर्तते । विधानविदितं मत्वा मा विचित्रा: कथा: कृथा:,देवयानी बोली--नरश्रेष्ठी सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ಓ ನರಶ್ರೇಷ್ಠ, ಎಲ್ಲರೂ ವಿಧಿಯ ವಿಧಾನದನ್ನೇ ಅನುಸರಿಸುತ್ತಾರೆ. ಇದನ್ನೂ ಸ್ಥಿರವಾದ ವಿಧಿಯ ವ್ಯವಸ್ಥೆ ಎಂದು ತಿಳಿದು ವಿಚಿತ್ರ ಕಥೆಗಳನ್ನು ಕಟ್ಟಬೇಡ; ಹೆಚ್ಚು ಪ್ರಶ್ನಿಸಬೇಡ.
Verse 13
राजवद् रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाच॑ं बिभर्षि च | को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्न शंस मे,आपके रूप और वेष राजाके समान हैं और आप ब्राह्मी वाणी (विशुद्ध संस्कृत भाषा) बोल रहे हैं। मुझे बताइये; आपका क्या नाम है, कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं?
ನಿನ್ನ ರೂಪವೂ ವೇಷವೂ ರಾಜನಂತಿವೆ; ನೀ ಬ್ರಾಹ್ಮೀ ವಾಣಿಯನ್ನೂ ಮಾತನಾಡುತ್ತೀಯ. ಹೇಳು—ನಿನ್ನ ಹೆಸರು ಏನು, ನೀ ಎಲ್ಲಿಂದ ಬಂದೆ, ಮತ್ತು ನೀ ಯಾರ ಪುತ್ರ?
Verse 14
ययातिरुवाच ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्न: श्रुतिपर्थ गत: । राजाहूं राजपुत्रश्न ययातिरिति विश्रुत:,ययातिने कहा--ैंने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು— ಬ್ರಹ್ಮಚರ್ಯವನ್ನು ಆಚರಿಸಿ ನಾನು ಸಂಪೂರ್ಣ ವೇದವನ್ನು ಅಧ್ಯಯನ ಮಾಡಿದ್ದೇನೆ; ಅದನ್ನು ಶ್ರುತಿ-ಪಥದಲ್ಲಿ ಸ್ಥಾಪಿಸಿದ್ದೇನೆ. ನಾನು ನಹುಷ ರಾಜನ ಪುತ್ರನು, ನಾನೇ ರಾಜನು; ‘ಯಯಾತಿ’ ಎಂಬ ಹೆಸರಿನಿಂದ ಪ್ರಸಿದ್ಧನು.
Verse 15
देवयान्युवाच केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागत: । जिधघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया,देवयानीने पूछा--महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं?
ದೇವಯಾನಿ ಕೇಳಿದಳು— ಹೇ ನೃಪತೇ! ಯಾವ ಕಾರ್ಯಾರ್ಥವಾಗಿ ನೀವು ಅರಣ್ಯದ ಈ ಪ್ರದೇಶಕ್ಕೆ ಬಂದಿದ್ದೀರಿ? ನೀರು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳಲು, ಅಥವಾ ಯಾವುದಾದರೂ ಕಮಲವನ್ನು ಕೀಳಲು, ಇಲ್ಲವೇ ಬೇಟೆಯ ಆಸೆಯಿಂದ ಬಂದಿದ್ದೀರಾ?
Verse 16
ययातिरुवाच मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागत: । बहुधाप्यनुयुक्तो5स्मि तदनुज्ञातुमहसि,ययातिने कहा--भटद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ। अत: अब मुझे आज्ञा दीजिये
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು— ಹೇ ಭದ್ರೇ! ನೀರು ಕುಡಿಯಲು ನಾನು ಇಲ್ಲಿ ಬಂದಿದ್ದೇನೆ. ಒಂದು ಕಾಡುಮೃಗವನ್ನು ಕೊಲ್ಲಲು ಹಿಂಬಾಲಿಸುತ್ತಿದ್ದೆ; ಅದರಿಂದ ನಾನು ದಣಿದಿದ್ದೇನೆ. ನೀನು ನನಗೆ ಅನೇಕ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ ಪ್ರಶ್ನಿಸಿದ್ದೀ— ಈಗ ನನಗೆ ಅನುಮತಿ ನೀಡಬೇಕು (ನೀರು ಕುಡಿದು ಮುಂದಕ್ಕೆ ಹೋಗಲು).
Verse 17
देवयान्युवाच द्वाभ्यां कन्न्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिछ्ठया सह । त्वदधीनास्मि भद्रें ते सखा भर्ता च मे भव,देवयानीने कहा--राजन! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन््याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे सखा और पति हो जायेँ
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು— ರಾಜನೇ! ನಿನಗೆ ಮಂಗಳವಾಗಲಿ. ನಾನು ಎರಡು ಸಾವಿರ ಕನ್ಯೆಯರೊಂದಿಗೆ, ನನ್ನ ದಾಸಿ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆಯೊಂದಿಗೆ, ನಿನ್ನ ಆಶ್ರಯಕ್ಕೆ ಬಂದಿದ್ದೇನೆ. ನೀನು ನನಗೆ ಸಖನಾಗಿಯೂ ಭರ್ತನಾಗಿಯೂ ಆಗು.
Verse 18
ययातिरु्वाच विद्धयौशनसि भद्र॑ ते न त्वामहोंडस्मि भाविनि । अविवाह्दा हि राजानो देवयानि पितुस्तव,ययाति बोले--शुक्रनन्दिनी देवयानी! आपका भला हो। भाविनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು— ಹೇ ಉಶನಸ್ (ಶುಕ್ರ)ನ ಪುತ್ರಿ ದೇವಯಾನಿ! ನಿನಗೆ ಮಂಗಳವಾಗಲಿ. ಹೇ ಭಾವಿನಿ! ನಾನು ನಿನಗೆ ಯೋಗ್ಯನಲ್ಲ. ದೇವಯಾನಿ, ನಿನ್ನ ತಂದೆಗೆ ರಾಜರೊಂದಿಗೆ (ಈ ರೀತಿಯಲ್ಲಿ) ವಿವಾಹಬಂಧ ಮಾಡುವುದು ಧರ್ಮಸಮ್ಮತವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸಲ್ಪಡುವುದಿಲ್ಲ.
Verse 19
देवयान्युवाच संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम् । ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाड़ वहस्व माम्,देवयानीने कहा--नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं। अतः मुझसे विवाह कीजिये
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ನಹುಷನಂದನನೇ! ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ವರ್ಣವು ಕ್ಷತ್ರಿಯರೊಂದಿಗೆ, ಕ್ಷತ್ರಿಯ ವರ್ಣವು ಬ್ರಾಹ್ಮಣರೊಂದಿಗೆ ಮಿಶ್ರವಾಗಿದೆ. ನೀ ರಾಜರ್ಷಿಯ ಪುತ್ರನು; ನೀನೇ ರಾಜರ್ಷಿಯೂ ಹೌದು. ಆದ್ದರಿಂದ ನನ್ನನ್ನು ವಿವಾಹವಾಗಿ ಸ್ವೀಕರಿಸು.
Verse 20
ययातिरुवाच एकदवेहोद्धवा वर्णश्षृत्वारोडपि वराड़ने । पृथग्धर्मा: पृथक्छौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वर:,ययाति बोले--वरांगने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है; परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सब वर्णोमें श्रेष्ठ हैं
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು—ವರಾಂಗನೇ! ಒಂದೇ ಪರಮೇಶ್ವರನ ದೇಹದಿಂದ ನಾಲ್ಕು ವರ್ಣಗಳು ಉದ್ಭವಿಸಿದವು; ಆದರೆ ಅವರ ಧರ್ಮಗಳು ಮತ್ತು ಶೌಚಾಚಾರಗಳು ವಿಭಿನ್ನ. ಅವರೆಲ್ಲರಲ್ಲೂ ಬ್ರಾಹ್ಮಣನೇ ಶ್ರೇಷ್ಠನು.
Verse 21
देवयान्युवाच पाणिधर्मो नाहुषायं न पुम्भि: सेवित: पुरा । त॑ मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं तत:,देवयानीने कहा--नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपहीने मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपटहीका मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ನಹುಷಕುಮಾರನೇ! ಸ್ತ್ರೀಯಿಗೆ ಪಾಣಿಗ್ರಹಣವು ಧರ್ಮ. ಹಿಂದೆ ಯಾವ ಪುರುಷನೂ ನನ್ನ ಕೈ ಹಿಡಿದಿರಲಿಲ್ಲ; ಮೊದಲಾಗಿ ನೀನೇ ನನ್ನ ಕೈ ಹಿಡಿದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ ಈಗ ನಾನು ನಿನ್ನನ್ನೇ ಪತಿಯಾಗಿ ವರಿಸುತ್ತೇನೆ.
Verse 22
कथं नु मे मनस्विन्या: पाणिमन्य: पुमान् स्पृशेत् गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यूषिणा त्वया,मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा पुरुष कैसे कर सकता है
ನಾನು ಮನಸ್ಸನ್ನು ವಶದಲ್ಲಿಟ್ಟಿರುವ ಸ್ತ್ರೀ. ನಿನ್ನಂತಹ ರಾಜರ್ಷಿಪುತ್ರನು—ಸ್ವಯಂ ರಾಜರ್ಷಿಯೇ—ನನ್ನ ಕೈಯನ್ನು ತಾನೇ ಹಿಡಿದ ಬಳಿಕ, ಮತ್ತೊಬ್ಬ ಪುರುಷನು ಅದನ್ನು ಹೇಗೆ ಸ್ಪರ್ಶಿಸಬಲ್ಲನು?
Verse 23
ययातिरुवाच क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् । दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता,ययाति बोले--देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प तथा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು—ದೇವಿ! ವಿವೇಕವಂತನಾದ ಪುರುಷನು ಬ್ರಾಹ್ಮಣನನ್ನು, ಕ್ರೋಧದಿಂದ ಉರಿಯುವ ವಿಷಸರ್ಪಕ್ಕಿಂತಲೂ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲ ದಿಕ್ಕುಗಳಿಂದ ಜ್ವಲಿಸುವ ಅಗ್ನಿಗಿಂತಲೂ ಹೆಚ್ಚು ದುರಾಧರ್ಷನೂ ಭಯಂಕರನೂ ಎಂದು ತಿಳಿಯಬೇಕು.
Verse 24
देवयान्युवाच कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात् | दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ,देवयानीने कहा--पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही?
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ಓ ಪುರುಷಶ್ರೇಷ್ಠನೇ! ವಿಷಸರ್ಪಕ್ಕಿಂತಲೂ, ಎಲ್ಲ ದಿಕ್ಕುಗಳಿಂದಲೂ ಜ್ವಲಿಸುವ ಅಗ್ನಿಗಿಂತಲೂ ಬ್ರಾಹ್ಮಣನು ಹೆಚ್ಚು ದುರಾಧರ್ಷನೆಂದು ನೀವು ಹೇಗೆ ಹೇಳಿದರು?
Verse 25
ययातिरुवाच एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्ष वध्यते । हन्ति विप्र: सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपित:,ययाति बोले--भटद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು—ಭದ್ರೇ! ವಿಷಸರ್ಪವು ಒಬ್ಬನನ್ನೇ ಕೊಲ್ಲುತ್ತದೆ; ಶಸ್ತ್ರವೂ ಒಂದೇ ಬಾರಿ ಒಬ್ಬನನ್ನೇ ಸಂಹರಿಸುತ್ತದೆ. ಆದರೆ ಕ್ರೋಧದಿಂದ ಉಗ್ರನಾದ ಬ್ರಾಹ್ಮಣನು ಸಮಸ್ತ ರಾಜ್ಯಗಳನ್ನೂ ನಗರಗಳನ್ನೂ ಸಹ ನಾಶಮಾಡಬಲ್ಲನು. ಆದ್ದರಿಂದ ನಾನು ಬ್ರಾಹ್ಮಣನನ್ನೇ ಹೆಚ್ಚು ದುರಾಧರ್ಷನೆಂದು ಭಾವಿಸುತ್ತೇನೆ. ಹೀಗಾಗಿ ನಿನ್ನ ತಂದೆ ವಿಧಿಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ನಿನ್ನನ್ನು ನನಗೆ ಒಪ್ಪಿಸುವವರೆಗೆ ನಾನು ನಿನ್ನನ್ನು ವಿವಾಹವಾಗುವುದಿಲ್ಲ.
Verse 26
दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम । अतोउतदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम्,ययाति बोले--भटद्रे! सर्प एकको ही मारता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर देता है। भीरु! इसलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು—ಓ ಭೀರು! ಆದ್ದರಿಂದ ನನ್ನ ಮತದಲ್ಲಿ ಬ್ರಾಹ್ಮಣನು ಹೆಚ್ಚು ದುರಾಧರ್ಷನು. ಹೀಗಾಗಿ ಭದ್ರೇ, ನಿನ್ನ ತಂದೆ ವಿಧಿಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ನಿನ್ನನ್ನು ನನಗೆ ನೀಡುವವರೆಗೆ ನಾನು ನಿನ್ನನ್ನು ವಿವಾಹವಾಗುವುದಿಲ್ಲ.
Verse 27
देवयान्युवाच दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन् वृतो मया । अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्नतः,(तिष्ठ राजन मुहूर्त तु प्रेषयिष्याम्यहं पितु: । देवयानीने कहा--राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं; उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे। अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। राजन! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ಓ ರಾಜನೇ! ನಾನು ನಿಮ್ಮನ್ನೇ ವರಿಸಿದ್ದೇನೆ; ಆದರೆ ನನ್ನ ತಂದೆ ವಿಧಿಪೂರ್ವಕವಾಗಿ ನನ್ನನ್ನು ನಿಮಗೆ ನೀಡಿದಾಗ ಮಾತ್ರ ನೀವು ನನ್ನನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸಿರಿ. ನೀವು ಸ್ವತಃ ಯಾಚಿಸುತ್ತಿಲ್ಲ; ದಾನವಾಗಿ ದೊರೆತ ಮೇಲೆ ಮಾತ್ರ ಗ್ರಹಿಸುವಿರಿ—ಆದುದರಿಂದ ಅವರ ಕೋಪದ ಭಯವಿಲ್ಲ. ರಾಜನೇ, ಕ್ಷಣಮಾತ್ರ ನಿಲ್ಲಿರಿ; ನಾನು ತಕ್ಷಣ ತಂದೆಗೆ ಸಂದೇಶ ಕಳುಹಿಸುತ್ತೇನೆ.
Verse 28
गच्छ त्वं धात्रिके शीघ्र ब्रह्म कल्पमिहानय ।। स्वयंवरे वृतं शीघ्रं निवेदय च नाहुषम् ।।) धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुषनन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है। वैशम्पायन उवाच त्वरितं देवयान्याथ संदिष्टं पितुरात्मन: । सर्व निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार देवयानीने तुरंत धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ಧಾತ್ರಿಕೇ! ಶೀಘ್ರ ಹೋಗಿ ಬ್ರಹ್ಮಸಮಾನನಾದ ನನ್ನ ತಂದೆಯನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಕರೆತಂದು. ಹಾಗೆಯೇ ನಹೂಷನಂದನನಿಗೂ ತಕ್ಷಣ ತಿಳಿಸು—ಸ್ವಯಂವರ ವಿಧಿಯಲ್ಲಿ ದೇವಯಾನಿ ರಾಜ ಯಯಾತಿಯನ್ನು ಪತಿಯಾಗಿ ವರಿಸಿದ್ದಾಳೆ ಎಂದು. ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ಅನಂತರ ದೇವಯಾನಿ ತಕ್ಷಣ ಧಾತ್ರಿಕೆಯನ್ನು ತಂದೆಯ ಬಳಿಗೆ ಸಂದೇಶದೊಂದಿಗೆ ಕಳುಹಿಸಿದಳು. ಧಾತ್ರಿಕೆ ಹೋಗಿ ಶುಕ್ರಾಚಾರ್ಯರಿಗೆ ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ಯಥಾತಥವಾಗಿ ನಿವೇದಿಸಿದಳು.
Verse 29
श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गव: | दृष्टवैव चागतं शुक्रे ययाति: पृथिवीपति: । वन्न््दे ब्राह्मणं काव्यं प्राउजलि: प्रणत: स्थित:,सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये
ಸುದ್ದಿ ಕೇಳಿದ ತಕ್ಷಣವೇ ಭಾರ್ಗವ ಶુક್ರಾಚಾರ್ಯನು ಅಲ್ಲಿ ಬಂದು ರಾಜನಿಗೆ ದರ್ಶನ ನೀಡಿದನು. ಶುಕ್ರನು ಬಂದಿರುವುದನ್ನು ಕಂಡ ಭೂಪತಿ ಯಯಾತಿ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ ಕಾವ್ಯನಿಗೆ ನಮಸ್ಕರಿಸಿ, ಕೈಜೋಡಿಸಿ ವಿನಯದಿಂದ ನಿಂತನು.
Verse 30
देवयान्युवाच राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् । नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे,देवयानी बोली--तात! ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आपको नमस्कार है। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगतमें इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी
ದೇವಯಾನಿ ಹೇಳಿದಳು—ತಂದೆ! ಇವನು ನಹುಷನ ಪುತ್ರನಾದ ರಾಜ ಯಯಾತಿ; ಅಪಾಯದ ವೇಳೆಯಲ್ಲಿ ಇವನು ನನ್ನ ಕೈ ಹಿಡಿದು ರಕ್ಷಿಸಿದನು. ನಿಮಗೆ ನಮಸ್ಕಾರ; ನನ್ನನ್ನು ಇವನಿಗೆ ದಯಪಾಲಿಸಿ. ಈ ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಇವನ ಹೊರತು ಬೇರೆ ಯಾರನ್ನೂ ಪತಿಯಾಗಿ ನಾನು ಆರಿಸುವುದಿಲ್ಲ.
Verse 31
शुक्र उवाच वृतोडनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया । गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज,शुक्राचार्यने कहा--वीर नहुषनन्दन! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है; अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो
ಶುಕ್ರನು ಹೇಳಿದನು—ವೀರ ನಹುಷಾತ್ಮಜ! ನನ್ನ ಪ್ರಿಯ ಪುತ್ರಿ ವೃತೋದನಾಳು ನಿನ್ನನ್ನೇ ಪತಿಯಾಗಿ ವರಿಸಿದೆ. ಆದ್ದರಿಂದ ನಾನು ನೀಡುವ ಈ ಕನ್ಯೆಯನ್ನು ಸ್ವೀಕರಿಸಿ, ಅವಳನ್ನು ಪ್ರಧಾನ ಮಹಿಷಿಯಾಗಿ ಮಾಡು.
Verse 32
ययातिरुवाच अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव | वर्णसंकरजो ब्रद्वान्निति त्वां प्रवृणोम्पहम्,ययाति बोले--भार्गव ब्रह्मन! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे
ಯಯಾತಿ ಹೇಳಿದನು—ಓ ಭಾರ್ಗವ ಬ್ರಾಹ್ಮಣ! ಈ ವಿವಾಹದಲ್ಲಿ ವರ್ಣಸಂಕರದಿಂದ ಹುಟ್ಟುವ ಈ ಮಹಾ ಅಧರ್ಮವು ನನ್ನನ್ನು ಸ್ಪರ್ಶಿಸದಿರಲಿ—ಇದೇ ನಾನು ನಿಮ್ಮಿಂದ ಬೇಡುವ ವರ.
Verse 33
शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुज्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम् | अस्मिन् विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते,शुक्राचार्यने कहा--राजन! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँग लो। इस विवाहको लेकर तुम्हारे मनमें ग्लानि नहीं होनी चाहिये। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ
ಶುಕ್ರನು ಹೇಳಿದನು—ರಾಜನೇ! ನಾನು ನಿನ್ನನ್ನು ಅಧರ್ಮದಿಂದ ವಿಮುಕ್ತನಾಗಿಸುತ್ತೇನೆ; ನಿನಗೆ ಇಷ್ಟವಾದ ವರವನ್ನು ಬೇಡು. ಈ ವಿವಾಹದ ವಿಷಯದಲ್ಲಿ ನಿನ್ನ ಮನಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಗ್ಲಾನಿ ಇರಬಾರದು; ನಿನ್ನ ಪಾಪವನ್ನು ನಾನು ದೂರ ಮಾಡುತ್ತೇನೆ.
Verse 34
वहस्व भार्या धर्मेण देवयानीं सुमध्यमाम् | अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्लुहि,तुम सुन्दरी देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो
ಶುಕ್ರನು ಹೇಳಿದನು—ಧರ್ಮಾನುಸಾರ ಸುವಕ್ಷಸ್ಥಳಿಯಾದ ದೇವಯಾನಿಯನ್ನು ಪತ್ನಿಯಾಗಿ ಸ್ವೀಕರಿಸು. ಅವಳೊಂದಿಗೆ ವಾಸಿಸಿ ನೀನು ಅಪೂರ್ವ ಆನಂದವನ್ನೂ ಪರಸ್ಪರ ತೃಪ್ತಿಯನ್ನೂ ಪಡೆಯುವಿ.
Verse 35
इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । सम्पूज्या सततं राजन् मा चैनां शयने ह्वये:,महाराज! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न बुलाना
ಶುಕ್ರನು ಹೇಳಿದನು—ಓ ರಾಜನೇ! ವೃಷಪರ್ವನ ಪುತ್ರಿಯಾದ ಈ ಕನ್ಯೆ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆಯೂ ನಿನಗೆ ಒಪ್ಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದ್ದಾಳೆ. ಅವಳನ್ನು ಸದಾ ಪೂಜ್ಯವಾಗಿ ಗೌರವಿಸು; ಆದರೆ ಅವಳನ್ನು ನಿನ್ನ ಶಯನಕ್ಕೆ ಎಂದಿಗೂ ಕರೆಯಬೇಡ.
Verse 36
(रहस्थेनां समाहूय न वर्दे्न च संस्पृशे: । वहस्व भार्या भद्रें ते यथाकाममवाप्स्यसि ।।) तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्र कृत्वा प्रदक्षिणम् । शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधिसे मंगलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया
ಶುಕ್ರನು ಹೇಳಿದನು—ಏಕಾಂತದಲ್ಲಿ ಅವಳನ್ನು ಕರೆಯಿಸಿಕೊಂಡರೂ ಅವಳೊಂದಿಗೆ ಮಾತಾಡಬೇಡ; ಅವಳ ದೇಹವನ್ನು ಸ್ಪರ್ಶಿಸಬೇಡ. ನಿನಗೆ ಮಂಗಳವಾಗಲಿ; ಧರ್ಮಾನುಸಾರ ಅವಳನ್ನು ಪತ್ನಿಯಾಗಿ ಸ್ವೀಕರಿಸು—ಅವಳಿಂದ ನೀನು ಇಚ್ಛಿತ ಫಲಗಳನ್ನು ಪಡೆಯುವಿ. ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ಹೀಗೆ ಹೇಳಲ್ಪಟ್ಟ ಯಯಾತಿ ಶುಕ್ರನಿಗೆ ಪ್ರದಕ್ಷಿಣೆ ಮಾಡಿ, ಶಾಸ್ತ್ರೋಕ್ತ ವಿಧಿಯಿಂದ ಶುಭ ವಿವಾಹವನ್ನು ನೆರವೇರಿಸಿದನು.
Verse 37
लब्ध्वा शुक्रान्महद् वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् | द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह,शुक्राचार्यसे देवयानी-जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ಶುಕ್ರನಿಂದ ಮಹಾ ಸಂಪತ್ತು, ಶ್ರೇಷ್ಠ ದೇವಯಾನಿ, ಹಾಗೆಯೇ ಶರ್ಮಿಷ್ಠೆಯೊಂದಿಗೆ ಎರಡು ಸಾವಿರ ಕನ್ಯೆಯರನ್ನು ಪಡೆದು, ದೈತ್ಯರೂ ಶುಕ್ರನೂ ಗೌರವಿಸಿದ ರಾಜ ಯಯಾತಿ ಆ ಮಹಾತ್ಮನ ಅನುಮತಿ ಪಡೆದು ಹರ್ಷದಿಂದ ತನ್ನ ರಾಜಧಾನಿಗೆ ಹೊರಟನು.
Verse 38
सम्पूजितश्न शुक्रेण दैत्यैश्न नृपसत्तम: । जगाम स्वपुरं हृष्टोडनुज्ञातो5थ महात्मना,शुक्राचार्यसे देवयानी-जैसी उत्तम कन्या, शर्मिष्ठा और दो हजार अन्य कन्याओं तथा महान् वैभवको पाकर दैत्यों एवं शुक्राचार्यसे पूजित हो, उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको गये
ಶುಕ್ರನಿಂದಲೂ ದೈತ್ಯರಿಂದಲೂ ಪೂಜಿತನಾದ ನೃಪಶ್ರೇಷ್ಠ ಯಯಾತಿ, ಆ ಮಹಾತ್ಮನ ಅನುಮತಿ ಪಡೆದು ಹರ್ಷದಿಂದ ತನ್ನ ನಗರಕ್ಕೆ ತೆರಳಿದನು.
Verse 81
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकाशीतितमो<ध्याय:
ಇಂತೆ ಶ್ರೀಮಹಾಭಾರತದ ಆದಿಪರ್ವದ ಸಂಭವಪರ್ವದಲ್ಲಿ ಯಯಾತ್ಯುಪಾಖ್ಯಾನಕ್ಕೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಎಂಭತ್ತೊಂದನೆಯ ಅಧ್ಯಾಯವು ಸಮಾಪ್ತವಾಯಿತು.
The chapter implicitly tests how a ruler should transition from sovereignty to renunciation: whether authority is an entitlement to continued enjoyment or a duty that culminates in disciplined withdrawal and accountability to karmic consequence.
Merit is depicted as structured practice rather than status: self-restraint, correct ritual conduct, and hospitality within ascetic life generate results, yet heavenly attainment remains conditional, emphasizing vigilance regarding pride and the stability of earned rewards.
Yes in functional form: Vaiśaṃpāyana characterizes the forthcoming continuation of Yayāti’s account as puṇyārthā (merit-producing) and sarva-pāpa-praṇāśinī (sin-destroying) to hear, marking an embedded listening-benefit claim.