सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘सगुण-साकार के सौंदर्य में चित्त-स्थापन’। बालकाण्ड मन को कथा-श्रवण योग्य बनाता है—नाम, रूप, गुण, लीला के माध्यम से चित्त की मलिनता घटाकर उसे मंगल-लग्न (अनुकूल काल) की तरह ‘अनुकूल-भाव’ में स्थिर करता है। प्रस्तुत खंड में विवाह-उत्सव का सामुदायिक आनंद ‘सत्संग’ का रूप लेता है: राम-रूप-दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है।
यह खंड ‘भक्ति का जन्म’ को सामाजिक उत्सव के माध्यम से दिखाता है: विवाह-बरात का बाह्य शृंगार अंततः अंतःकरण के ‘भक्ति-आनंद’ में रूपांतरित होता है। ‘जनक सुकृत मूरति बैदेही’—सीता को पुण्य का साकार फल बताकर तुलसी यह संकेत देते हैं कि ईश्वर-समागम केवल भाग्य नहीं, दीर्घकालीन सुकृत और शुद्ध चित्त की परिपक्वता है। ‘दसरथ सुकृत रामु धरें देही’—राम का देह-धारण भी भक्त-समाज के पुण्य-संचय से जुड़ा दिखता है: ईश्वर की लीला लोक-कल्याण हेतु ‘अनुकूल-काल’ में प्रकट होती है। नारियों का ‘लोचन-लाभ’ प्रतीक है कि दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है—रूप का ध्यान चित्त को एकाग्र करता है और वही एकाग्रता नाम-स्मरण की भूमि बनती है (निर्गुण-सगुण-संयोग: रूप-ध्यान से नाम-ध्यान तक)। देव-समाज का विस्मय इस सौंदर्य को ‘अलौकिक’ ठहराता है—यह केवल राजसी विवाह नहीं, सगुण ब्रह्म का मंगल-प्राकट्य है।
Verse 642 (चौपाई)
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।। इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे।। इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।। हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।। जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।। पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।। कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।। बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
Verse 643 (दोहा/सोरठा)
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
Verse 644 (चौपाई)
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।। तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।। सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।। स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।। कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।। भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।। लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।। मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
Verse 645 (छंद)
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।। पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।। ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।
Verse 646 (दोहा/सोरठा)
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।311।।
Verse 647 (चौपाई)
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।। जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।। कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।। गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।। मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।। ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।। पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।। सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
Verse 648 (दोहा/सोरठा)
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल।।312।।
Verse 649 (चौपाई)
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।। सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।। संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।। सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।। लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।। कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।। भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।। गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
Verse 650 (दोहा/सोरठा)
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।313।।
Verse 651 (चौपाई)
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।। सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।। प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।। देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे।। चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।। नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।। तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।। बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
Verse 652 (दोहा/सोरठा)
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु। हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
Verse 653 (चौपाई)
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।। करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।। एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।। देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।। साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।। सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।। मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।। पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
Verse 654 (दोहा/सोरठा)
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
Verse 655 (चौपाई)
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।। ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।। सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।। सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई।। बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।। राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।। जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे।। कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
Verse 656 (छंद)
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई।। जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।
Verse 657 (दोहा/सोरठा)
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव। भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव।।316।।
Verse 658 (चौपाई)
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।। संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।। हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।। निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।। सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।। रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।। देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।। मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
Verse 659 (छंद)
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी।। एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।
Verse 660 (दोहा/सोरठा)
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।317।।
Verse 661 (चौपाई)
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।। पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।। सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।। कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।। बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।। सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।। कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।। करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
Verse 662 (छंद)
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।। आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।
Verse 663 (दोहा/सोरठा)
जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु।।318।।
Verse 664 (चौपाई)
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।। बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।। पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।। करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।। दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।। समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।। नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।। एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।
Verse 665 (छंद)
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं।। ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं।।
Verse 666 (दोहा/सोरठा)
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ। मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ।।319।।
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