अध्याय १५ — कीचकस्य अत्याचारः, द्रौपद्याः सभाशरणगमनम्
Kīcaka’s coercion and Draupadī’s appeal in the assembly
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचक-द्रीपदी- संवादविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ,कीचकस्तु सुकेशान्ते मूढो मदनदर्पित: । सो<वमंस्यति मां दृष्टवा न यास्ये तत्र शोभने कमनीय केशोंवाली सुन्दरी! मूर्ख कीचक तो काम-मदसे उन्मत्त हो रहा है। वह मुझे देखते ही अपमानित कर बैठेगा। इसलिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगी
kīcakas tu sukeśānte mūḍho madanadarpitaḥ | so ’vamāṁsyati māṁ dṛṣṭvā na yāsye tatra śobhane ||
សៃរន្ធ្រីបាននិយាយថា៖ «តែគីចក—មនុស្សល្ងង់វង្វេង ហើយអួតអាងដោយមោទនភាពនៃកាម—កំពុងស្រវឹងដោយកាមមោហៈ។ ពេលគាត់ឃើញខ្ញុំភ្លាម គាត់នឹងប្រមាថខ្ញុំ។ ដូច្នេះ ឱ ស្រីស្រស់ស្អាតមានសក់ល្អឆើតឆាយ ខ្ញុំនឹងមិនទៅទីនោះឡើយ»។
वैशम्पायन उवाच