कामबन्धन-निवृत्ति तथा शान्तिलक्षण-उपदेशः | Release from Desire-Bondage and the Marks of Peace
गृहस्थ ब्राह्मणके लिये विद्वानोंने चार प्रकारकी आजीविका बतायी है--कोठेभर अनाजका संग्रह करके रखना, यह पहली जीविकावृत्ति है। कुंडेभर अन्नका संग्रह करना, यह दूसरी वृत्ति है तथा उतने ही अन्नका संग्रह करना जो दूसरे दिनके लिये शेष न रहे, यह तीसरी वृत्ति है। अथवा “कापोतीवृत्ति” (उज्छवृत्ति) का आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करे, यह चौथी वृत्ति है। इन चारोंमें पहलीकी अपेक्षा दूसरी-दूसरी वृत्ति श्रेष्ठ है। अन्तिम वृत्तिका आश्रय लेनेवाला धर्मकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ है और वही सबसे बढ़कर धर्मविजयी है ।। षट््कर्मा वर्तयत्येकस्त्रिभिरन्य: प्रवर्तते । द्वाभ्यामेकश्नतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रे व्यवस्थित:,पहली श्रेणीके अनुसार जीविका चलानेवाले ब्राह्मणको यजन-याजन, अध्ययन- अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह--ये छ: कर्म करने चाहिये। दूसरी श्रेणीवालेको अध्ययन, यजन और दान--इन तीन कर्मोमें ही प्रवृत्त होना चाहिये। तीसरी श्रेणीवालेको अध्ययन और दान-ये दो ही कर्म करने चाहिये तथा चौथी श्रेणीवालेको केवल ब्रह्मयज्ञ (वेदाध्ययन) करना उचित है
vyāsa uvāca | ṣaṭkarmā vartayaty ekaḥ tribhir anyaḥ pravartate | dvābhyām ekaś caturthas tu brahmasatre vyavasthitaḥ ||
វ្យាសៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ ក្នុងចំណោមព្រះព្រាហ្មណ៍អ្នកគ្រួសារ បណ្ឌិតទាំងឡាយបានពណ៌នារបបរស់នៅ ៤ ប្រភេទ ដែលតម្រៀបតាមកម្រិតនៃភាពបរិសុទ្ធ និងការអត់ធ្មត់៖ (១) រក្សាទុកស្រូវអង្ករពេញឃ្លាំង, (២) រក្សាទុកបម្រុងតិចជាង, (៣) រស់នៅដោយមានតែអ្វីដែលមិនសល់សម្រាប់ថ្ងៃបន្ទាប់, និង (៤) រស់នៅដោយ “កាបោតីវ្រឹត្តិ” ឬ “ឧញ្ឆវ្រឹត្តិ” ដូចព្រាប—យកតែអ្វីដែលមានឲ្យដោយសេរី មិនប្រមូលស្តុក។ ក្នុងលំដាប់នេះ របបនីមួយៗដែលបន្តទៅមុខ ល្អប្រសើរជាងមុនៗ; អ្នកដែលយករបបចុងក្រោយ ត្រូវបានចាត់ថាជាអ្នកលើកំពូលក្នុងធម៌ និងជាអ្នកឈ្នះក្នុងសេចក្តីសុចរិត។ ដូច្នេះ ព្រះព្រាហ្មណ៍មួយអាចប្រតិបត្តិកម្មទាំង៦; មួយទៀតកំណត់ត្រឹម៣; មួយទៀតត្រឹម២; ខណៈដែលទី៤ ស្ថិតនៅក្នុង “ព្រះព្រហ្មយញ្ញ” — ការបូជាខ្លួនដោយវិន័យតាមរយៈការសិក្សាវេដ។
व्यास उवाच