शल्मलि–पवनसंवादः
The Dialogue of Śalmali and Pavana
महाप्रस्थानमाश्रित्य लुब्धक: पक्षिजीवक: । निश्चेष्टो मरुदाहारो निर्मम: स्वर्गकांक्षया,मैं भी इसी प्रकार तपस्या करके परम गतिको प्राप्त होऊँगा, ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके पक्षियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाला वह बहेलिया वहाँसे महाप्रस्थानके पथका आश्रय लेकर चल दिया। उसने सब प्रकारकी चेष्टा त्याग दी। वायु पीकर रहने लगा। स्वर्गकी अभिलाषासे अन्य सब वस्तुओंकी ओरसे उसने ममता हटा ली
mahāprasthānam āśritya lubdhakaḥ pakṣijīvakaḥ | niśceṣṭo marudāhāro nirmamaḥ svargakāṅkṣayā ||
ភីෂ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ អ្នកបាញ់សត្វ—អ្នកចិញ្ចឹមជីវិតដោយសត្វស្លាប—បានយកផ្លូវ “មហាប្រស្ថាន” ជាទីពឹង ហើយចេញដំណើរ។ គាត់ក្លាយជាមនុស្សមិនធ្វើអ្វីទៀត រស់ដោយខ្យល់ជាអាហារ ហើយដោយប្រាថ្នាសួគ៌ គាត់ក្លាយជាមនុស្សគ្មានមមតា ដកការចាប់យក “របស់ខ្ញុំ” ចេញពីអ្វីៗទាំងអស់។
भीष्म उवाच