अध्याय ५०: उत्तरेण सह अर्जुनस्य रथप्रयाणे ध्वजचिह्नैः कौरवसेनानिर्देशः
Arjuna directs Uttara by identifying Kaurava commanders through banners
दहत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णी भाति दिवाकर: । तूष्णीं धारयते लोकान् वसुधा सचराचरान्,विद्वान् पुरुष बहुत-सी लड़ाइयाँ जीतकर, असंख्य धनराशि पाकर तथा शत्रुओंकी सेनाको परास्त करके भी इस तरह व्यर्थ बकवाद नहीं करते। आग बिना कुछ कहे-सुने ही सबको जलाकर भस्म कर देती है, सूर्यदेव मौन रहकर ही प्रकाशित होते हैं, पृथ्वी चुप रहकर ही सम्पूर्ण चराचर लोकोंको धारण करती है (इनमेंसे कोई अपने पराक्रमकी प्रशंसा नहीं करता)
dahaty agnir avākyas tu tūṣṇīṁ bhāti divākaraḥ | tūṣṇīṁ dhārayate lokān vasudhā sa-carācarān ||
クリパは言った。「火は語らずして燃え、太陽は沈黙のうちに輝き、地は言葉なくして動くものも動かぬものも含む諸世界を支える。同じく、真に賢い者は—多くの戦に勝ち、莫大な富を得、敵軍を粉砕した後でさえ—むなしい自賛に耽らない。力は行いによって証され、誇り言葉によってではない。」
कृप उवाच