Nakula’s Reception in Matsya: Appointment as Aśvasūta
Horse-master
त॑ प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले व्याजात् प्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् । विराजमान परमेण वर्चसा सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम्,छटद्मावेशसे अपने स्वरूपको छिपाकर सभाभवनमें आया हुआ वह शत्रुविजयी वीर पुरुष अपने उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहा था। गजराजके समान बल-विक्रमवाले उस महेन्द्रपुत्र अर्जुनको देखकर राजाने समस्त सभासदोंसे पूछा--“यह कहाँसे आया है? आजसे पहले मैंने कभी इसके विषयमें नहीं सुना है।” राजाके पूछनेपर उन मनुष्योंमेंसे किसीने उस पुरुषको अपना परिचित नहीं बताया। तब राजाने आश्चर्ययुक्त होकर यह बात कहीं--
taṁ prekṣya rājopagataṁ sabhātale vyājāt pratichannam aripramāthinām | virājamānaṁ parameṇa varcasā sutaṁ mahendrasya gajendravikramam ||
彼が王の集会殿へ入って来るのを見た—身分を意図して隠しながらも、敵を砕く勇者として—その身は至高の光輝に照り映えていた。象王のごとき力と歩みをもつマヘーンドラの子(アルジュナ)を見て、王は廷臣すべてに問うた。「この者はどこから来たのだ。今日に至るまで、名さえ聞いたことがない。」王が尋ねても、そこにいた誰一人として彼を知る者だとは名乗らなかった。そこで王は驚嘆に満ちて、さらに言葉を継いだ。
वैशम्पायन उवाच