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Shloka 6

व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विज: । सुदुर्लभमपि हान्नं दीयतामिति सोडब्रवीत्‌,वे कभी ऐसे समयमें लौटकर आते थे, जब कि पृथाको दूसरे कामोंसे दम लेनेकी भी फुरसत नहीं होती थी और कभी वे कई दिनोंतक आते ही नहीं थे। आनेपर भी ऐसा भोजन माँग लेते जो अत्यन्त दुर्लभ होता

そのバラモンは、時に不都合な時刻に戻り、また幾日も姿を見せぬことがしばしばあった。やがて来ると『食を与えよ』と言い、得がたいほど稀な食物を求めた。

वैशम्पायन उवाच