Sāvitrī-Upākhyāna: Dyumatsena’s Restoration and the Return to Kāmyaka
Conclusion
गतास्तु दक्षिणामाशां ये वै वानरपुड्रवा: । आशावांस्तेषु काकुत्स्थ: प्राणानातों5भ्यधारयत्,जो प्रमुख वानर दक्षिण दिशाकी ओर गये थे, उन्हींसे सीताका वास्तविक समाचार मिलनेकी आशा बँधी हुई थी, इसीलिये व्यथित होनेपर भी श्रीरामचन्द्रजी अपने प्राणोंको धारण किये रहे
南へ向かった精鋭の猿たちにこそ、カークッツタ(ラーマ)はシーターの真の消息を得る望みを託していた。ゆえに胸を痛めながらも、彼はなお命をつなぎ、報せを待ち続けた。
मार्कण्डेय उवाच