Sāvitrī’s Report and Nārada’s Prognosis (सावित्र्याख्यान—सत्यवान्-गुणवर्णनं तथा अल्पायुषः पूर्वसूचना)
लोहिताक्षं महाबाहुं मत्तमातड्रगामिनम् । कम्बुग्रीवं महोरस्क॑ नीलकुज्चितमूर्थजम्,उन सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंने राजाके इस समयोचित प्रस्तावका अनुमोदन किया। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर नेत्र कुछ-कुछ लाल थे और भुजाएँ बड़ी एवं घुटनों तक लंबी थीं। वे मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे। उनकी ग्रीवा शंखके समान सुन्दर थी, उनकी छाती चौड़ी थी और उनके सिरपर काले-काले घुँघराले बाल थे। उनकी देह दिव्य दीप्तिसे दमकती रहती थी। युद्धमें उनका पराक्रम देवराज इन्द्रसे कम नहीं था। वे समस्त धर्मोंके पारंगत विद्वान् और बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे। सम्पूर्ण प्रजाका उनमें अनुराग था। वे सभी विद्याओंमें प्रवीण तथा जितेन्द्रिय थे। उनका अद्भुत रूप देखकर शत्रुओंके भी नेत्र और मन लुभा जाते थे। वे दुष्टोंका दमन करनेमें समर्थ, साधुओंके संरक्षक, धर्मात्मा, धैर्यवान, दुर्धर्ष, विजयी तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाले थे। कुरुनन्दन! कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले अपने पुत्र श्रीरामको देख-देखकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता होती थी
lohītākṣaṃ mahābāhuṃ mattamātaṅgagāminam | kambugrīvaṃ mahoraskaṃ nīlakuñcitamūrdhajam ||
マールカンデーヤは言った。「その眼は赤みを帯び、腕は雄大で、酔える象のように誇り高く揺らめく歩みをした。首は法螺貝(シャンカ)のごとく美しく、胸は広く、頭には黒く巻いた髪が冠のようにかかっていた。」
मार्कण्डेय उवाच
The verse uses auspicious physical markers to signal moral and royal fitness: true authority is portrayed as a harmony of strength, dignity, and self-mastery—qualities expected of one who protects dharma.
Mārkaṇḍeya is describing the hero’s appearance in elevated, poetic terms—emphasizing majesty (elephant-like gait), beauty (conch-like neck), and power (mighty arms, broad chest) as part of a larger account praising Rāma’s exemplary nature.