स्कन्दोपाख्यानम् — उत्पातशान्तिः, स्वाहारूपविचारः, कौमारमङ्गलक्रियाः
४. प्राणकी स्तुतिका वर्णन अथर्ववेदमें और प्रश्नोपनिषदमें बहुत आया है। - तात्पर्य यह है कि हृदयमें रहनेवाला प्राण, नाभिमें रहनेवाले समानसे जाकर मिलता है। इसी तरह गुदामें रहनेवाला अपान कंठवर्ती उदानसे जा मिलता है, इस दशामें प्राण, अपान और समानका नाभिमें संघर्ष होनेसे जो अग्नि उत्पन्न होती है, उसे ही 'जठरानल' नाम दिया गया है। वही इस शरीरमें अन्नको पचाकर उसके रससे शरीरको पुष्ट करता है। - प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम--ये सोलह कलाएँ हैं (देखिये प्रश्नोपनिषद् ६।४)। चतुर्दशाधिकद्विशततमो< ध्याय: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन मार्कण्डेय उवाच एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर । दृढ्प्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! धर्मव्याधने जब इस प्रकार पूर्णरूपसे मोक्ष- धर्मका वर्णन किया, तब कौशिक ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे यों बोला
mārkaṇḍeya uvāca | evaṃ saṃkathite kṛtsne mokṣadharme yudhiṣṭhira | dṛḍhaprītamanā vipro dharmavyādham uvāca ha ||
マールカンデーヤは語った。「ユディシュティラよ。ダルマ・ヴャーダがこのようにして解脱の法(モークシャ・ダルマ)を余すところなく説き終えると、婆羅門カウシカは堅く歓喜に満たされた心で、ダルマ・ヴャーダに次のように語りかけた。」
मार्कण्डेय उवाच
The verse frames moksha-dharma as a complete ethical-spiritual instruction that can come from an unexpected source (the Dharma-vyadha), emphasizing receptivity, humility, and the transformative power of dharma when properly understood.
Markandeya narrates to Yudhishthira that, after the Dharma-vyadha finishes his full discourse on moksha-dharma, the brahmin listener—now deeply pleased—begins to respond, setting up the next exchange.