Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना | अजित जेतुकामेन भाव्यं सड्लेष्वसज्धिना,जो जितेन्द्रिय है, जिसने मनपर अधिकार प्राप्त कर लिया है तथा जो अजित पदको जीतनेकी इच्छा करता है, नित्य तपस्यामें संलग्न रहनेवाले उस मुनिको आसक्ति-जनक भोगोंसे अलग--अनासक्त रहना चाहिये
「常に苦行に励み、自らを調御し、心を統御する牟尼は、諸根を克服し、なお未だ克服されぬ境地を勝ち取らんと欲する者である。ゆえに、執着を生む享楽から離れ、無著に住すべきである。」
व्याध उवाच