Adhyāya 128 — Proposal to Restrain Keśava; Sātyaki’s Warning and Vidura–Dhṛtarāṣṭra Counsel
आत्मानमेव प्रथम द्वेष्यरूपेण योजयेत् । ततोअमात्यानमित्रांश्व न मोघं विजिगीषते,“अतः पहले अपने मनको ही शत्रुके स्थानपर रखकर इसे जीते। तत्पश्चात् मन्त्रियों और शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छा करे। ऐसा करनेसे उसकी विजय पानेकी अभिलाषा कभी व्यर्थ नहीं होती है
ゆえに、まず己の心を敵として据え、それを征服せよ。しかる後に、大臣と敵とに勝たんと望め。そうすれば、その勝利への希求は決して空しくはならぬ。
वैशम्पायन उवाच