ययातिपतनम् — Yayāti’s Fall and the Offer of Dharma
Nārada’s Account
वैदूर्याडकुरकल्पानि मृदूनि हरितानि च । चरन्तीश्लक्षणशष्पाणि तिक्तानि मधुराणि च,इस क्रमसे माधवी वैदूर्यमणिके अंकुरोंके समान सुशोभित, कोमल, चिकनी, तिक्त, मधुर एवं हरी-हरी घास चरती, पवित्र नदियोंके शुद्ध, शीतल, निर्मल एवं सुस्वादु जल पीती और मृगोंके आवासभूत, व्याप्ररहित एवं दावानलशून्य निर्जन वनोंमें मृगोंके साथ वनचारिणी मृगीकी भाँति विचरण करती थी। उसने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक महान् धर्मका आचरण किया
vaidūryāṅkurakalpāni mṛdūni haritāni ca | carantī ślakṣṇaśaṣpāṇi tiktāni madhurāṇi ca ||
ナーラダは言った。「彼女は、ヴァイドゥーリヤ(vaidūrya、猫目石)の芽にも似た、柔らかく滑らかな青い草を食んだ――その味わいは、ほのかな苦みと甘みとを同時に帯びていた。」
नारद उवाच