Gandhārī’s Lament for Bhūriśravas and Śakuni
Book 11, Chapter 24
एकवत्त्रार्थसंवीता: प्रकीर्णासितमूर्थजा: । स्नुषास्ते परिधावन्ति हतापत्या हतेश्वरा:,“आपकी पुत्रवधुएँ एक वस्त्र अथवा आधे वस्त्रसे ही शरीरको ढँककर अपनी काली- काली लटें छिटकाये इस युद्धभूमिमें चारों ओर दौड़ रही हैं। इन सबके पुत्र और पति भी मारे जा चुके हैं
あなたの嫁たちは、一枚の衣、あるいは半ばの衣で身を覆うばかりで、黒髪を乱れ散らして、この戦場をあちらこちらへ駆け回っている。彼女らの子も夫も、すでに討たれてしまったのだ。
वैशम्पायन उवाच