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Shloka 14

ऋत्विग्धर्मः, दक्षिणा-न्यायः, तपसः परमार्थः

Ritvij-Dharma, the Norm of Dakṣiṇā, and the Higher Meaning of Tapas

तेन क्रीतेन यज्ञेन ततो यज्ञ: प्रतायते । इत्येवं धर्मतो ध्यातमृषिभिर्थर्मचारिभि:,दक्षिणाद्वारा उस सोमरसके साथ खरीद किये हुए यज्ञ-साधनोंसे यजमानके यज्ञका विस्तार होता है। धर्मका आचरण करनेवाले ऋषियोंने इस विषयमें धर्मके अनुसार ऐसा ही विचार व्यक्त किया है

ダクシナーによって購い得たソーマと、同じく購い備えた祭具とをもって行われるその祭祀によって、祭主のヤジュニャはさらに広がり、充実してゆく。法を行ずるリシたちは、このことを法にかなって思惟し、まさにその通りであると述べた。

भीष्म उवाच