राजा-दैवतत्वम् — The King as a Stabilizing ‘Daivata’ (Divine Function) in Social Order
यदतप्तं प्रणमते नैतत् संतापमर्हति । यत् स्वयं नमते दारु न तत् संनामयन्त्यपि,जो राष्ट्र बिना कष्ट पाये ही नतमस्तक हो जाता है, वह अधिक संतापका भागी नहीं होता। जो लकड़ी स्वयं ही झुक जाती है, उसे लोग झुकानेका प्रयत्न नहीं करते हैं
yad-ataptaṁ praṇamate na etat santāpam arhati | yat svayaṁ namate dāru na tat saṁnāmayanty api ||
ビーシュマは言った。「苦難に焼かれる前に自ら頭を垂れる者は、それゆえにさらに苦しみを受けるべきではない。自らしなる木は人に無理に押し倒されぬように、進んで謙り従う者もまた、たいてい余計な強制を受けない。」
भीष्म उवाच