Brāhmaṇa-Dharma, Āśrama Eligibility, and the Primacy of Rāja-Dharma (Śānti Parva 63)
भीष्मजीने कहा--प्रभो! भरतवंशावतंस युधिष्ठिर! चारों आश्रम ब्राह्मणोंके लिये ही विहित हैं। अन्य तीनों वर्णोके लोग उन सभी आश्रमोंका अनुसरण नहीं करते हैं ।। उक्तानि कर्माणि बहूनि राजन् स्वर्ग्याणि राजन्यपरायणानि । नेमानि दृष्टान्तविधौ स्मृतानि क्षात्रे हि सर्व विहितं यथावत्,राजन! क्षत्रियके लिये शास्त्रमें बहुत-से ऐसे स्वर्गसाधक कर्म बताये गये हैं, जो हिंसाप्रधान हैं, जैसे युद्ध। परंतु ये कर्म ब्राह्मणके लिये आदर्श नहीं हो सकते; क्योंकि क्षत्रियके लिये सभी प्रकारके कर्मोका यथोचित विधान है
yudhiṣṭhira uvāca | uktāni karmāṇi bahūni rājan svargyāṇi rājanyaparāyaṇāni | nemāni dṛṣṭāntavidhau smṛtāni kṣātre hi sarvaṃ vihitaṃ yathāvat ||
ユディシュティラは言った。「王よ、天界に至らしめる多くの行いが説かれておりますが、それらは主として武人の務めに属するものです。されど、それを万人のための普遍の先例として模範に据えるべきではありません。なぜならクシャトリヤに対しては、聖典が、戦いのように暴力を伴い得る義務をも含め、あらゆる行為について完全で相応しい規範を定めているからです。」
युधिषछ्िर उवाच