नरनारायण-नारदसंवादः
Nara-Nārāyaṇa–Nārada Discourse on Vision, Elements, and Entry into Vāsudeva
न होष क्षयतां याति सोम: सुरगणैर्यथा । कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति,देवतालोग चन्द्रमाका अमृत पीकर जिस प्रकार उसे क्षीण कर देते हैं, उस प्रकार सूर्यदेवका क्षय नहीं होता। धूममार्गसे चन्द्रमण्डलमें गया हुआ जीव कर्मभोग समाप्त होनेपर कम्पित हो फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ता है। इसी प्रकार नूतन कर्मफल भोगनेके लिये वह पुन: चन्द्रलोकमें जाता है (सारांश यह कि चन्द्रलोकमें जानेवालेको आवागमनसे छुटकारा नहीं मिलता है)
na hoṣa kṣayatāṃ yāti somaḥ suragaṇair yathā | kampitaḥ patate bhūmiṃ punaś caivādhirohati ||
ナーラダは言った。「太陽は、神々の群れによって減じられる月のように、衰えることはない。同じく、煙の道によって月界に至った者も、業福の享受が尽きれば震えて地上へ落ち、さらに新たに積んだ業の果を味わうため、また月界へと昇る。ゆえに、月に至る者は往来の輪から解き放たれぬ。」
नारद उवाच