Adhyāya 325: Nārada in Śvetadvīpa—Stotra to the Nirguṇa Mahātman
स तस्यासनमादिश्य निश्चक्राम ततः पुनः । त॑ चारुवेषा: सुश्रोण्यस्तरुण्य: प्रियदर्शना:,परं पञ्चाशतं नार्यो वारमुख्या: समाद्रवन् । वहाँ उनके लिये सुन्दर आसन बताकर राजमन्त्री पुन: प्रमदावनसे बाहर निकल आये। मन्त्रीके जाते ही पचास प्रमुख वारांगनाएँ शुकदेवजीके पास दौड़ी आयीं। उनकी वेश-भूषा बड़ी मनोहारिणी थी। वे सब-की-सब देखनेमें परम सुन्दरी और नवयुवती थीं। वे सुरम्य कटिप्रदेशसे सुशोभित थीं। उनके सुन्दर अंगोंपर लाल रंगकी महीन साड़ियाँ शोभा पा रही थीं। तपाये हुए सुवर्णके आभूषण उनका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे। वे बातचीत करनेमें कुशल और नाचने-गानेकी कलामें बड़ी प्रवीण थीं। उनका रूप अप्सराओंके समान था, वे मन्द मुसकानके साथ बातें करतीं और दूसरोंके मनका भाव समझ लेती थीं। कामचर्यामें कुशल और सम्पूर्ण कलाओंका विशेष ज्ञान रखनेवाली थीं
sa tasyāsanam ādiśya niścakrāma tataḥ punaḥ | taṁ cāruveṣāḥ suśroṇyas taruṇyaḥ priyadarśanāḥ, paraṁ pañcāśataṁ nāryo vāramukhyāḥ samādravan |
ビーシュマは語った。「彼にふさわしい座を示すと、大臣は再び外へ出た。大臣が去るや否や、五十人の名高い遊女たちが彼のもとへ駆け寄った。いずれも若く、目を奪う容姿で、装いは優雅、腰つきはしなやかで、姿かたちは愛らしい。衣と飾りはその美をいっそう際立たせ、言葉のやり取りにも、歌舞にも巧みで、他者の心の機微を読み取る術を心得ていた。『シャーンティ・パルヴァ』(Śānti Parva)の倫理的文脈において、この場面は意図された試練として置かれている。すなわち、霊性に向かう者の前に世の快楽と社交の艶を差し出し、心の不動と欲望の制御を試すのである。」
भीष्म उवाच