देवतापितृप्रश्नः — Nārada at Badarīāśrama: the ultimate referent of daiva and pitṛ worship
फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत् स्थिते । अनित्ये प्रियसंवासे कं स्वपिषि पुत्रक,बेटा! यह शरीर जलके फेनकी तरह क्षणभंगुर है। इसमें जीव पक्षीकी तरह बसा हुआ है और यह प्रियजनोंका सहवास भी सदा रहनेवाला नहीं है। फिर भी तुम क्यों सोये पड़े हो?
phenamātropame dehe jīve śakunivat sthite | anitye priyasaṃvāse kaṃ svapiṣi putraka ||
ヴィヤーサは言った。「愛しい我が子よ、この身は水の泡のごとく刹那に消える。そこに宿る生ある自己は、枝に仮住まいする鳥のようなものだ。愛する者との同居さえ永遠ではない。この無常を知りながら、なぜ眠りに伏しているのか――なぜ不覚のまま、動かずにいるのか。」
व्यास उवाच