Śoka-śamana: Kṛṣṇa’s Consolation and Nārada’s Exempla to Sṛñjaya
Chapter 29
कि वा तूष्णीं ध्यायसे सूंजय त्वं न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि । न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं पथ्य॑ मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम्,'सूृंजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो। राजन! मेरी इस बातको क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुषके ऊपर अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया?”
ki vā tūṣṇīṁ dhyāyase sūñjaya tvaṁ na me rājan vācam imāṁ śṛṇoṣi | na cen moghaṁ vipralaptaṁ mamedaṁ pathyaṁ mumūrṣor iva suprayuktam ||
ヴァーユは言った。「なぜ黙して座し、スーニジャヤよ、思いに沈んでいるのか。王よ、なぜわが言葉を聞かぬのか。わが諫言が徒労に終わらぬように—死の淵にある者に、いかに巧みに薬を施しても無益となる、そのようであってはならぬ。」
वायुदेव उवाच