पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
“इस प्रकार विचार करनेसे एक तो वह नारी होनेके कारण ही अवध्य है, दूसरे मेरी पूजनीया माता है। माताका गौरव पितासे भी बढ़कर है, जिसमें मेरी माँ प्रतिष्ठित है। नासमझ पशु भी स्त्री और माताको अवध्य मानते हैं (फिर मैं समझदार मनुष्य होकर भी उसका वध कैसे करूँ?) ।। देवतानां समावायमेकस्थं पितरं विदु: । मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम्,“मनीषी पुरुष यह जानते हैं कि पिता एक स्थानपर स्थित सम्पूर्ण देवताओंका समूह है; परंतु माताके भीतर उसके स्नेहवश समस्त मनुष्यों और देवताओंका समुदाय स्थित रहता है (अत: माताका गौरव पितासे भी अधिक है)
devatānāṁ samavāyam ekasthaṁ pitaraṁ viduḥ | martyānāṁ devatānāṁ ca snehād abhyeti mātaram ||
ビーシュマは説いた。「このように思案すれば、第一に、彼女は女であるがゆえに、その本性において殺されるべきではない。第二に、彼女はわが敬うべき母である。母の尊厳は父よりもなお高い。母のうちにこそ、子の生命と敬愛の根が据えられているからだ。思慮なき獣でさえ、本能によって女と母を侵してはならぬものと知る—まして分別ある人間である私が、どうして彼女に暴力を加えられようか。賢者は、父とは一処にあって諸天の総体を体現するものだと知る。だが母は、その慈愛によって、死すべき人々と神々の共同体すべてを己の内に抱く—ゆえに母の偉大さは父をも凌ぐ。」
भीष्म उवाच