सूक्ष्मभूत-भूतात्मविज्ञानम्
Knowing the subtle principle and the bhūtātman through yoga
प्रादेशमात्रे हृदि निःसृतं यत् तस्मिन् प्राणानात्मयाजी जुहोति । तस्याग्निहोत्रं हुतमात्मसंस्थं सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु,आत्मयज्ञ करनेवाला ज्ञानी पुरुष नाभिसे लेकर हृदयतकका जो प्रादेशमात्र स्थान है, उसमें प्रकट हुई जो चैतन्यज्योति है, उसीमें समस्त प्राणोंकी--इन्द्रिय, मन आदिकी आहुति देता है अर्थात् समस्त प्राणादिका आत्मामें लय करता है। उसका प्राणाग्निहोत्र यद्यपि अपने शरीरके भीतर ही होता है तथापि वह सर्वात्मा होनेके कारण उसके द्वारा देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें प्राणाग्निहोत्रकर्म सम्पन्न हो जाता है; अर्थात् उसके प्राणोंकी तृप्तिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके प्राण तृप्त हो जाते हैं
prādeśamātre hṛdi niḥsṛtaṃ yat tasmin prāṇān ātmayājī juhoti | tasyāgnihotraṃ hutam ātmasaṃsthaṃ sarveṣu lokeṣu sadevakeṣu ||
ヴィヤーサは言った。内なる祭を行う智者は、心中の、ただ一掌ほどの空間に立ち現れた意識の炎へ、諸々の生命力を供える。彼のアグニホートラは自らの内に捧げられるが、普遍の自己と同一であるがゆえに、神々を伴うあらゆる世界において成就したものとなる。かくして、己のプラーナが鎮まり満たされることにより、宇宙全体の生命力もまた、あたかも満たされるのである。
व्यास उवाच