Śakra–Namuci-saṃvāda: Śoka-nivāraṇa and Daiva-vicāra
Indra and Namuci on grief, composure, and inevitability
त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम् | नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुः:खवहो मतः,जो लोग मुक्तिके लिये प्रयत्नशील हों, उन सबको चाहिये कि सम्पूर्ण कर्मोमें अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करे। जो इनका त्याग किये बिना ही विनीत (शाम, दम आदि साधनोंमें तत्पर) होनेका झूठा दावा करते हैं, उन्हें अविद्या आदि दुःखदायी क्लेश प्राप्त होते हैं
tyāga eva hi sarveṣāṁ yuktānām api karmaṇām | nityaṁ mithyā-vinītānāṁ kleśo duḥkhavaho mataḥ ||
ビーシュマは言った。「捨離こそが、あらゆる行為の真の成就である。たとえ戒めを守り、正しい修行に励む者であっても同じだ。だが、我執・我所・執着・欲望を捨てぬまま、常に謙虚と自制を偽って唱える者には、無明などの煩悩(クレーシャ)が起こり、それは苦を運ぶものと説かれる。」
भीष्म उवाच