Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
अथास्य बुद्धिरभवद् विधिनाहं श्वजाघनीम् । भक्षयामि यथाकामं पूर्व संतर्प्प देवता:,इतनेहीमें उनके मनमें यह विचार उठा कि मैं कुत्तेकी जाँघके इस मांसको विधिपूर्वक पहले देवताओंको अर्पण करूँगा और उन्हें संतुष्ट करके फिर अपनी इच्छानुसार उसे खाऊँगा
そのとき彼の心に思いが起こった。「この犬の腿肉は、法にかなった作法によって食すべきだ。まず神々に供えて満足させ、そののちに我が望むままに口にしよう。」
भीष्म उवाच