आपद्धर्मे राज्ञः नीतिः — Bharadvāja’s Counsel on Crisis-Statecraft (Śānti Parva 138)
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्न यः । द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्रो विनश्यति,जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, वह “अनागतविधाता' और जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका कोई उपाय सूझ जाता है, वह 'प्रत्युत्पन्नमति'-- ये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परंतु प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला *दीर्घसूत्री' नष्ट हो जाता है
anāgatavidhātā ca pratyutpannamatiś ca yaḥ | dvāv eva sukham edhete dīrghasūtro vinaśyati ||
ビーシュマは言った。「危難が未だ来たらぬうちに備えを立てる者は『アナーガタ・ヴィダーター(未然を制する者)』。また、危急のただ中にあって即座に自護の策を見いだす者は『プラティユトパンナ・マティ(臨機の智ある者)』。この二者のみが安らかに栄える。だが、いたずらに事を引き延ばす『長糸の者』(先延ばしの徒)は滅びに至る。」
भीष्म उवाच