दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीति: कौरवेषु न: । इति पौरा: सुदु:खार्ता: क्रोशन्ति सम पुन: पुन:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
durvinīteṣu lubdheṣu kā prītiḥ kauraveṣu naḥ | iti paurāḥ suduḥkhārtāḥ krośanti sama punaḥ punaḥ ||
ヴィドゥラは言った。「カウラヴァたちが不作法で、貪欲に駆られているというのに、どうして我らが彼らに情愛を抱けようか。」こうして都の民は、激しい悲嘆に押しつぶされ、幾度も幾度も叫び嘆いた。その嘆きは、カウラヴァの長老たちの幼稚な振る舞いを責め、貪りによってパーンドゥの子らを国から追い払うことを糾弾し、パーンダヴァを失えば皆が孤児となるとの思いと、統治におけるアダルマへの道義的憤りを語っていた。
विदुर उवाच