द्रोणपर्व अध्याय ६७ — अर्जुनस्य प्रवेशः, श्रुतायुध-वधः, सुदक्षिण-वधः
Arjuna’s advance; deaths of Śrutāyudha and Sudakṣiṇa
तुभ्यं तुभ्यमिति प्रादान्निष्कान् निष्कान् सहस्रश: । ततः पुनः समाश्चास्य निष्कानेव प्रयच्छति,“तुम्हारे लिये, तुम्हारे लिये” कहकर वे हजारों निष्क दान किया करते थे। इतनेपर भी जो ब्राह्मण पाये बिना रह जाते, उन्हें पुनः आश्वासन देकर वे बहुत-से निष्क ही देते थे
「汝に、汝に」と言いながら、彼はニシュカを幾千と施した。それでもなお受け取れずにいる婆羅門があれば、彼は再び言葉をかけて安心させ、さらに多くのニシュカを与えた。
नारद उवाच