Śalya–Bhīma Gadāyuddham (मद्रराज-भीमसेन गदायुद्धम्)
भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुत्थितम् । चर्मनिस्त्रिंशयो राजन् निर्विशेषमदृश्यत,राजन्! उस समय नीचे घुमाने, ऊपर घुमाने, अगल-बगलमें चारों ओर घुमाने और फिर ऊपर उठानेकी क्रियाएँ इतनी तेजीसे हो रही थीं कि ढाल और तलवारमें कोई अन्तर ही नहीं दिखायी देता था
王よ! 下へ回し、上へ回し、左右へ四方に回し、さらに再び高く掲げる――その一連の所作があまりに疾く、盾と剣との別さえ見分けがつかぬほどであった。
संजय उवाच