भीष्म-युधिष्ठिर-संमर्दः
Bhīṣma’s Pressure on Yudhiṣṭhira; Śikhaṇḍī’s Approach; Evening Withdrawal
वरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजा: । विविशुस्ते पर॑ं सैन्यं सिंहा इव वनाद् वनम्,उनके रथ नगरोंके समान प्रतीत होते थे। उनमें मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। नाना प्रकारके रूप-रंगवाली और विचित्र पताकाएँ उन्हें अलंकृत कर रही थीं। ऐसे रथोंपर आरूढ़ सुन्दर धनुष धारण किये विचित्र कवच और ध्वजोंसे सुशोभित उन वीरोंने शत्रुकी सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे सिंह एक वनसे दूसरे वनमें प्रवेश करते हैं
sañjaya uvāca |
varacāpadharā vīrā vicitrakavacadhvajāḥ |
viviśus te paraṃ sainyaṃ siṃhā iva vanād vanam ||
サञ्जयは言った。「優れた弓を携え、奇なる鎧と旗に飾られた英雄たちは、獅子が森から森へ踏み入るように、敵軍の中へと突入した。」
संजय उवाच