भीष्मवधोपाय-प्रश्नः (Inquiry into the means to overcome Bhīṣma) | Chapter 103
मण्डलीकृतमेवास्य धनु: पश्याम भारत । सूर्यममण्डलसंकाशं दहतस्तव वाहिनीम्,भारत! आपकी सेनाको भस्म करते हुए उस अभिमन्युके धनुषको हम सदा सूर्यमण्डलके सदृश मण्डलाकार हुआ ही देखते थे फिर अत्यन्त उतावलीके साथ रोषावेशमें भरे हुए उस महाबली राक्षसने कुपित हो उन महामनस्वी पाँचों भाइयोंके घोड़ों और सारथियोंको भी मार डाला
sañjaya uvāca |
maṇḍalīkṛtam evāsya dhanuḥ paśyāmi bhārata |
sūryamaṇḍalasaṅkāśaṃ dahatas tava vāhinīm ||
サンジャヤは言った。「バーラタよ、私はアビマンニュの弓を、絶えず円を描くかのように見ている。太陽の円盤に等しく輝きつつ、汝の軍勢を焼き払ってゆくのだ。」
संजय उवाच