Uttanka’s Guru-Śuśrūṣā and the Commission to Retrieve the Maṇikuṇḍalas (उत्तङ्क-गुरुशुश्रूषा तथा मणिकुण्डल-आदेशः)
उत्तडुक उवाच अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो | तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम्,उत्तंक बोले--प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमिमें जल बड़ा ही दुर्लभ है
ウッタンカは言った。「おお主よ、遍く力ある御方(ヴィブフ)よ! もし願いを求めることが、わたしにとって必ず果たすべき務めだとお考えなら、わたしの望みはただ一つ――ここで望むだけの水を得たいのです。この砂漠では水がまことに得難いのです。」
उत्तडुक उवाच