Adhyāya 33: Brāhmaṇa-Upadeśa on Buddhi, Āśrama-Forms, and Inner Freedom
नाहमस्मि यथा मां त्वं पश्यसे च शुभाशुभे । मया व्याप्तमिदं सर्व यत् किंचिज्जगतीगतम्,ब्राह्मणने कहा--भीरु! तुम अपनी बुद्धिसे मुझे जैसा समझकर फटकार रही हो, मैं वैसा नहीं हूँ। मैं इस लोकमें देहाभिमानियोंकी तरह आचरण नहीं करता। तुम मुझे पाप- पुण्यमें आसक्त देखती हो; किंतु वास्तवमें मैं ऐसा नहीं हूँ। मैं ब्राह्मण, जीवन्मुक्त महात्मा, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी सब कुछ हूँ। इस भूतलपर जो कुछ दिखायी देता है, वह सब मेरेद्वारा व्याप्त है
nāham asmi yathā māṃ tvaṃ paśyase ca śubhāśubhe | mayā vyāptam idaṃ sarvaṃ yat kiṃcij jagatīgatam ||
バラモンは言った。「吉凶・善悪で量る者よ、私はそなたが見るような者ではない。この世にある一切—いかなる存在も—は、我によって遍満されている。」
ब्राह्मण उवाच