Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाड्चालो यदा तदा । त्वद्धोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये
abhīṣekṣyati māṁ rājye sa pāñcālo yadā tadā | tvadbhogyaṁ bhavitā tāta sakhe satyena te śape ||
ヴァイシャンパーヤナは言った。「パーンチャーラの王がいつの日か、わたしに灌頂(アビシェーカ)を施して王位に就けるなら、その時わたしの国はあなたの享受のためのものとなりましょう、尊き方よ。友よ、わたしは真実そのものにかけて誓う。わたしの歓楽も栄華も幸福も、すべてあなたの命に従う。」そう言い終えると、武器の学に通じ、わたしに敬われた彼は、自国へと帰っていった。
वैशम्पायन उवाच