Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
ऑपन--माज बक। चॉ-ज:ड: - गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वानूको भी गौतम कहा जाता था। - धर्नुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं--मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त। छोड़े जानेवाले बाण आदिको "मुक्त! कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड़्ग आदिको “अमुक्त” कहते हैं। जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र 'मुक्तामुक्तर कहलाता है। जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र 'मन्त्रमुक्त' कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र--ये भी धरनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार--इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं। त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी बीटा* और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाज: प्रतापवान् | अनब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रतापी द्रोण राजा ट्रपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले--'राजन! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ
vaiśampāyana uvāca |
tato drupadam āsādya bhāradvājaḥ pratāpavān |
anabravīt pārthivaṃ rājan sakhāyaṃ viddhi mām iha ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。そこで勇猛なるバールァドヴァージャの子ドローナはドルパダ王に近づき、君主にこう告げた。「王よ、ここにいる我を汝の友と知れ。汝に会うために来たのだ。」
वैशम्पायन उवाच