Vidura’s Recall from Kāmyaka-vana and Reconciliation with Dhṛtarāṣṭra (विदुरानयनम् / क्षमायाचनम्)
उपलभ्य तत: कर्णो विवृत्य नयने शुभे । रोषाद् दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च,तब उसके आशयको समझकर कर्णने रोषसे अपनी सुन्दर आँखें फाड़कर दुःशासन, शकुनि और दुर्योधनकी ओर देखते हुए स्वयं ही उत्साहमें भरकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक कहा --“भूमिपालो! इस विषयमें मेरा जो मत है, उसे सुन लो
वैशम्पायन उवाच