ऋतुपर्णस्य विदर्भयात्रा-निश्चयः तथा बाहुकस्य हयपरिक्षा (Ṛtuparṇa’s resolve to go to Vidarbha and Bāhuka’s examination of horses)
ख्यात: प्राज्ञ: कुलीनश्न सानुक्रोशो भवान् सदा । संवृत्तो निरनुक्रोश: शड्के मद्धाग्यसंक्षयात्,“आप विख्यात विद्वान, कुलीन और सदा सबके प्रति दयाभाव रखनेवाले हैं, परंतु मेरे हृदयमें यह संदेह होने लगा है कि आप मेरा भाग्य नष्ट होनेके कारण मेरे प्रति निर्दय हो गये हैं
युदेव उवाच