धृतराष्ट्र–संजय संवादः
Dhṛtarāṣṭra and Sañjaya on Arjuna’s Indraloka report and the political consequences
देवराज इन्द्रके इस मनोरम निवासस्थानमें तुम्हारे शुभागमनके उपलक्ष्यमें एक महान् उत्सव मनाया गया। यह उत्सव स्वर्गलोकका सबसे बड़ा उत्सव था। उसमें रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और वसुगण--इन सबका सब ओरसे समागम हुआ था। नरश्रेष्ठ! महर्षिसमुदाय, राजर्षिप्रवर, सिद्ध, चारण, यक्ष तथा बड़े-बड़े नाग--ये सभी अपने पद, सम्मान और प्रभावके अनुसार योग्य आसनोंपर बैठे थे। इन सबके शरीर अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी थे और ये समस्त देवता अपनी अद्भुत समृद्धिसे प्रकाशित हो रहे थे। विशाल नेत्रोंवाले इन्द्रकुमार! उस समय गन्धर्वोद्वारा अनेक वीणाएँ बजायी जा रही थीं। दिव्य मनोरम संगीत छिड़ा हुआ था और सभी प्रमुख अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। कुरुकुलनन्दन पार्थ! उस समय तुम मेरी ओर निर्निमेष नयनोंसे निहार रहे थे || २३-- २८ || तत्र चावभृथे तस्मिन्नुपस्थाने दिवौकसाम् । तव पित्राभ्यनुज्ञाता गता:ः स्वं स्व गृहं सुरा:
tatra cāvabhṛthe tasminn upasthāne divaukasām | tava pitrābhyanujñātā gatāḥ svaṃ sva gṛhaṃ surāḥ ||
Then, at that concluding rite of the festival—within that august assembly of the dwellers of heaven—the gods, having received permission from your father (Indra), departed each to his own abode. The scene underscores celestial order and propriety: even the mighty act within protocol, taking leave only after the sovereign’s assent.
अर्जुन उवाच