चक्षुष्मन्तं च तं दृष्टवा राजानं वपुषान्वितम् । मूर्थ्ना निपतिता: सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचना:,तत्पश्चात् राजा झ्युमत्सेनको नेत्रयुक्त और स्वस्थ शरीरसे सुशोभित देखकर उन सबके नेत्र आश्चवर्यससे खिल उठे और सबने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया
मार्कण्डेय उवाच