Sūrya-stava: Dhaumya’s Counsel and the Aṣṭaśata-nāma of Sūrya
त्वं गति: सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् । अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम्,सम्पूर्ण सांख्ययोगियोंके प्राप्तव्य स्थान आप ही हैं। आप ही सब कर्मयोगियोंके आश्रय हैं। आप ही मोक्षके उन्मुक्त द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओंकी गति हैं
युधिछिर उवाच