Sāvitrī’s Trirātra-Vrata and Departure with Satyavān (सावित्रीव्रतनिश्चयः सहगमनं च)
-+ 3 ()) अप आस एकोनाशीरत्याधिकद्विशततमो< ध्याय: रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि- संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप मार्कण्डेय उवाच सखा दशरथस्यासीज्जटायुररुणात्मज: । गृध्रराजो महावीर: सम्पातिर्यस्य सोदर:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! महावीर गृध्रराज जटायु (सूर्यके सारथि) अरुणके पुत्र थे। उनके बड़े भाईका नाम सम्पाति था। राजा दशरथके साथ उनकी बड़ी मित्रता थी इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कबन्धवधविषयक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २७९ ॥। #:2:8 #23:.7 (0) हि २ 7 अशीत्यथिकद्विशततमो< ध्याय: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन मार्कण्डेय उवाच ततो<विदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम् | सीताहरणदु:खार्त: पम्पां राम: समासदत्
Mārkaṇḍeya uvāca—sakhā Daśarathasyāsīj Jaṭāyur Aruṇātmajaḥ | gṛdhrarājo mahāvīraḥ Sampātir yasya sodaraḥ ||
Mārkaṇḍeya said: “Jaṭāyu, the heroic king of vultures, was a friend of King Daśaratha and a son of Aruṇa. His own brother was Sampāti.”
मार्कण्डेय उवाच