Brahmāstra-prayogaḥ: Daśagrīvasya Māyā-vadhaḥ
Rāma–Rāvaṇa Encounter under Illusion
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत जयद्रथविगोक्षणपर्वमें दो यौ बद्दत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २७२ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ई “लोक मिलाकर कुल ८१३ श्लोक हैं) उन “5 (9) #...# >_5..# (रामोपाख्यानपर्व) त्रिसप्तत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: अपनी दुरवस्थासे दुःखी हुए युधिष्ठटिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना जनमेजय उवाच एवं ह्वतायां कृष्णायां प्राप्प क्लेशमनुत्तमम् । अत ऊर्ध्व॑ नरव्याप्रा: किमकुर्वत पाण्डवा:,जनमेजयने पूछा--इस प्रकार द्रौपदीका अपहरण होनेपर महान् क्लेश उठानेके पश्चात् मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डवोंने कौन-सा कार्य किया?
janamejaya uvāca | evaṁ hṛtāyāṁ kṛṣṇāyāṁ prāptaṁ kleśam anuttamam | ata ūrdhvaṁ naravyāghrāḥ kim akurvata pāṇḍavāḥ ||
Janamejaya said: “When Kṛṣṇā (Draupadī) had been carried off and the Pāṇḍavas—tiger-like among men—had fallen into unsurpassed distress, what did they do thereafter?”
जनमेजय उवाच